नई कविता
मंजिल क़रीब आते ही थकान हो गई। जब सफर हुआ पूरा तो शाम हो गई।।
मां
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है।
मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।।....मुनव्वर राना
शनिवार, 11 जून 2011
प्रेस कांफ्रेंस ऑफ़ सोशलिस्ट पार्टी
1 टिप्पणी:
yuvjan
11 जून 2011 को 9:39 pm बजे
bhai jaan mast
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bhai jaan mast
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