मां

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है।

मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।।....मुनव्वर राना

शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010

मेरी नई ग़ज़ल

ग़जल


मंजिल क़रीब आते ही थकान हो गई।

जब सफर हुआ पूरा तो शाम हो गई।।


सोचा नहीं था मैंने तुम यूं मुझे मिलोगी।

लगता है तपती रेत पर बरसात हो गई।।


आज जाके तुमने मुझको पलट के देखा।

लगता है पूरी मन की मुराद हो गई।।


ग़ायब है ग़म मेरा जो साथ रहा वर्षों।

तुम्हारे बिना जिन्दगी आसान हो गई।।


बचपन से सुन रहा था ये देश है हमारा।

आंगन में मगर अब तो दीवार हो गई।।


वो है बहुत अकेला जो था कभी तुम्हारा।

मुझसे मिली तबीयत तो पहचान हो गई।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन से सुन रहा था ये देश है हमारा,,आंगन में मगर अब तो दीवार हो गयी,,अपने आप में मुकम्मल है,,मकसद बताने में कामयाब है,,दिल को छूती है,,लेकिन मिलने बिछड़ने के रूहानी एहसास के बीच,,,ये पंकितयां मुहाजिर सी लगती हैं,,इसको यहाँ पर क्यों प्रस्तुत किया आपने समझ नहीं आया!!
    एक और बात,,"" मैंने के साथ,,मुझे होना चाहिए,,और हमें के साथ हमारा"",,जहाँ तक मेरी जानकारी है हिंदी व्याकरण कि,,,जैसे आपकी ये पंक्तियाँ हैं,,"'सोचा नहीं था मैंने, तुम यूं हमें मिलोगी"" कुछ अतिरिक्त शब्द भी हैं,,जैसे,,जब सफ़र हुआ पूरा.....,,में जब कि ज़रूरत नहीं लगती है!!!
    लेकिन इन सब से हट कर,,मिलावट से अलग एक शुद्ध रचना है,,इसके लिए आपको बधाई!!!!

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  2. सुना था जिंदगी जीने की कला है,एहसास भी यही होता आया है,लेकिन जब जिंदगी में शब्द आवाज बन जाती है तो जिंदगी की ताकत बढ़ जाती है,औऱ इसका मुकम्मल तस्वीर आपके शब्द बयां कर रहे हैं,जो सोचा था,यहां पाया,मन से बाहर जो शब्द आजतक आवाज नहीं बन सके,वो यहां महसूस हुआ औऱ शायद लगता है कि हममें भी इतनी ताकत आ गई है कि जिंदगी को करीब से महसूस कर सकूं और नदी के हिलकोरे के साथ उस किनारे तक जाऊं जहां लगे कि तूफान आने वाला है, और समंदर की ज्वालामुखी बनकर उस मुकाम को छुऊं जहां रब बसता है,,यही इल्तजा और यही दुआ,शुभकामना ह्रिदय से आपके लिए भी है।
    Raghbendra Kumar

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  3. बहुत ख़ूब राजेश जी...आपकी इस ग़ज़ल को पढ़के सारी थकान दूर हो गई...इस नई कविता के आग़ाज़ के लिए आपका आदाब करता हूं...अब मंज़िल भी देर-सबेर मिल ही जाएगी...मैं तो यही कहूंगा...अभी तो पूरी राह बाक़ी है मुझे न थकाना...मंज़िल तो बस है सफ़र पर चलने का बहाना...

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