नई कविता
मंजिल क़रीब आते ही थकान हो गई। जब सफर हुआ पूरा तो शाम हो गई।।
मां
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है।
मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।।....मुनव्वर राना
शनिवार, 11 जून 2011
प्रेस कांफ्रेंस ऑफ़ सोशलिस्ट पार्टी
नई पोस्ट
पुराने पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)