ग़जल
मंजिल क़रीब आते ही थकान हो गई।
जब सफर हुआ पूरा तो शाम हो गई।।
सोचा नहीं था मैंने तुम यूं मुझे मिलोगी।
लगता है तपती रेत पर बरसात हो गई।।
आज जाके तुमने मुझको पलट के देखा।
लगता है पूरी मन की मुराद हो गई।।
ग़ायब है ग़म मेरा जो साथ रहा वर्षों।
तुम्हारे बिना जिन्दगी आसान हो गई।।
बचपन से सुन रहा था ये देश है हमारा।
आंगन में मगर अब तो दीवार हो गई।।
वो है बहुत अकेला जो था कभी तुम्हारा।
मुझसे मिली तबीयत तो पहचान हो गई।।